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लोकतंत्र की चीख : पत्रकारों को डराने की साजिश पर चुप क्यों हैं मुख्यमंत्री और जनसंपर्क आयुक्त?

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🔥 मुख्यमंत्री के गृह जिले से लोकतंत्र पर हमला! 🔥

👉 जशपुर में पत्रकारों को करोड़ों की मानहानि नोटिस

👉 फोन पर आत्महत्या में फँसाने की धमकी

👉 शासकीय ग्रुप का निजीकरण कर पत्रकारों का अपमान

👉 कलेक्टर मौन… पुलिस प्रशासन खामोश!

जशपुरनगर।  मुख्यमंत्री के गृह जिले जशपुर में पत्रकारों को धमकाकर चुप कराने की साजिश ने लोकतंत्र की बुनियाद को हिला दिया है। आरोप है कि जनसंपर्क विभाग की सहायक संचालक नूतन सिदार ने अपने कर्मचारी रविन्द्र की थाने में दी गई शिकायत को हथियार बनाकर पत्रकारों पर करोड़ों की मानहानि नोटिस दाग दिए और धमकियों का सिलसिला शुरू कर दिया। पत्रकारों को फोन पर आत्महत्या में फँसाने की धमकी तक मिली। इस घटनाक्रम ने यह गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या यह सब किसी बड़े संरक्षण या मौन सहमति के बिना संभव था?

करोड़ों की मानहानि और धमकियों की बौछार

पत्रकारों को डराने और दबाव बनाने के लिए एक-एक करोड़ रुपये के मानहानि नोटिस भेजे गए। इतना ही नहीं, धमकियों का स्तर इस कदर बढ़ गया कि फोन पर “आत्महत्या के लिए जिम्मेदार ठहराकर फँसाने” तक की बातें कही गईं। यह सिर्फ एक अधिकारी की मनमानी नहीं, बल्कि शासन-प्रशासन की भूमिका पर भी गंभीर प्रश्न उठाता है।

जनसंपर्क आयुक्त पर सवाल

जनसंपर्क विभाग सीधे मुख्यमंत्री के अधीन होता है। मौजूदा जनसंपर्क आयुक्त, जो पूर्व में जशपुर कलेक्टर भी रह चुके हैं, इस पूरे घटनाक्रम से अंजान नहीं हो सकते। सवाल उठ रहे हैं—

क्या आयुक्त को जशपुर के इस विवाद की जानकारी नहीं है? अगर जानकारी है, तो अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई? और अगर जानकारी नहीं है, तो क्या विभाग बेलगाम और बेकाबू हो चुका है?

मुख्यमंत्री की चुप्पी सबसे बड़ा प्रश्न

जनसंपर्क विभाग सीधे मुख्यमंत्री के अधीन है। ऐसे में जब पत्रकारों पर करोड़ों की मानहानि नोटिस दागे जा रहे हैं, आत्महत्या में फँसाने जैसी धमकियाँ दी जा रही हैं, और शासकीय ग्रुप का निजीकरण कर पत्रकारों का अपमान किया जा रहा है—तो मुख्यमंत्री अब तक चुप क्यों हैं?

क्या मुख्यमंत्री की यह चुप्पी नूतन सिदार और उनके संरक्षकों को संरक्षण देने का काम कर रही है?

कलेक्टर और प्रशासन की मौन सहमति

शासकीय ग्रुप में हुए इस पूरे अपमानजनक घटनाक्रम के दौरान स्वयं कलेक्टर रोहित व्यास मौजूद थे। बावजूद इसके, उन्होंने कोई कार्रवाई नहीं की। स्क्रीनशॉट सोशल मीडिया पर वायरल हुए, लेकिन न तो कलेक्टर बोले, न पुलिस प्रशासन हरकत में आया। प्रशासन की यह चुप्पी साफ संकेत देती है कि सत्ता और तंत्र दोनों पत्रकारों को डराने की इस साजिश में मौन सहमति से शामिल हैं।

लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी

यह घटनाक्रम केवल जशपुर तक सीमित नहीं है। यह उस मानसिकता को उजागर करता है जहां पत्रकारों को चुप कराने के लिए सरकारी तंत्र का खुलेआम दुरुपयोग किया जा रहा है। लोकतंत्र की रीढ़ माने जाने वाली पत्रकारिता पर यह सीधा हमला है।

जनता के सवाल मुख्यमंत्री से

क्या मुख्यमंत्री बताएंगे कि उनके अधीन आने वाला जनसंपर्क विभाग अब ‘जन विभाग’ न होकर ‘भय विभाग’ क्यों बन गया है? क्या नूतन सिदार और उनके संरक्षकों पर कोई कार्रवाई होगी? या फिर यह मान लिया जाए कि यह पूरी साजिश शीर्ष स्तर की मौन स्वीकृति से संचालित हो रही है?

संयुक्त पत्रकार संघ ने खोला मोर्चा, 10 सितम्बर को जशपुरनगर में जुटेंगे प्रदेशभर के पत्रकार

जिले में पत्रकारों को धमकाने और उनकी आवाज़ दबाने के खिलाफ अब प्रदेश स्तर पर बड़ा आंदोलन खड़ा होने जा रहा है। संयुक्त पत्रकार संघ ने घोषणा की है कि आगामी 10 सितम्बर 2025 (बुधवार) को प्रदेशभर के पत्रकार जशपुरनगर में एकत्रित होंगे।

संयुक्त पत्रकार संघ का कहना है कि जशपुर में पत्रकारों को एक-एक करोड़ के मानहानि नोटिस भेजना, आत्महत्या में फँसाने की धमकी देना और शासकीय ग्रुप का निजीकरण कर उनका अपमान करना लोकतंत्र पर सीधा हमला है। अब यह केवल स्थानीय मुद्दा नहीं रहा, बल्कि पूरे प्रदेश के पत्रकारों की अस्मिता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सवाल बन गया है। पत्रकार संघ ने स्पष्ट किया है कि अगर इस मामले में शासन-प्रशासन ने त्वरित कार्रवाई नहीं की, तो आंदोलन को और व्यापक रूप दिया जाएगा।


आह्वान:

संयुक्त पत्रकार संघ ने प्रदेश के सभी पत्रकारों से अपील की है कि वे 10 सितम्बर को जशपुरनगर पहुँचकर इस ऐतिहासिक संघर्ष का हिस्सा बनें और लोकतंत्र की आवाज़ को बुलंद करें।

निष्कर्ष:

जशपुर का यह प्रकरण लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है। यदि मुख्यमंत्री और जनसंपर्क आयुक्त इस पर त्वरित कार्रवाई नहीं करते, तो यह संदेश जाएगा कि सरकार अब पत्रकारों की कलम तोड़ने की खुली मुहिम चला रही है।

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