राज्यपाल के आदेश बनाम सचिव का स्पष्टीकरण — कानून से बड़ा पत्र कैसे?

उड़िसा भुवनेश्वर ख़ोज ख़बर छत्तीसगढ संवाददाता


भुवनेश्वर।
ओडिशा में गुटखा और निकोटीन युक्त पान मसाला प्रतिबंध को लेकर सरकारी तंत्र खुद अपने जाल में उलझता नजर आ रहा है। एक ओर 21 जनवरी को राज्यपाल के आदेश से राज्य में सख्त प्रतिबंध लागू किया गया, वहीं दूसरी ओर 29 जनवरी को स्वास्थ्य विभाग के सचिव द्वारा जारी एक “स्पष्टीकरण” ने पूरे आदेश को कमजोर कर दिया।
इस विरोधाभास ने प्रशासन, पुलिस और प्रवर्तन एजेंसियों को असमंजस में डाल दिया है।
संवैधानिक सवालों के घेरे में सरकार
कानूनी विशेषज्ञों का सीधा सवाल है—
राजपत्र (Gazette) में प्रकाशित राज्यपाल के आदेश को क्या किसी सचिव का पत्र निष्प्रभावी कर सकता है?
यदि ऐसा है, तो फिर अधिसूचना और संवैधानिक प्रक्रिया का औचित्य ही क्या रह जाता है?
विशेषज्ञ इसे संवैधानिक मर्यादाओं का खुला उल्लंघन मान रहे हैं।

छापेमारी में उलझी पुलिस
प्रतिबंध के बाद शुरू हुई छापेमारी के दौरान अब हालात यह हैं कि
कौन-सा माल जब्त किया जाए?
किसे “सादा मुखवास” मानकर छोड़ा जाए?
कौन दोषी और कौन कानूनी?
इन सवालों ने पुलिस और खाद्य सुरक्षा विभाग को पंगु बना दिया है।
मुखवास की आड़ में नशे का खुला खेल
तंबाकू उद्योग से जुड़े कारोबारी “सादा मुखवास” के नाम पर वही घातक उत्पाद बाजार में उतार रहे हैं।
सड़कों, बस स्टैंडों और मीडिया में बड़े-बड़े होर्डिंग्स लगे हैं, लेकिन
👉 प्रशासनिक सख्ती नदारद है।
स्वास्थ्य आपदा की ओर ओडिशा
स्वास्थ्य आंकड़े खुद सरकार के ढुलमुल रवैये पर सवाल खड़े करते हैं—
ओडिशा में 42% वयस्क तंबाकू सेवन करते हैं
यह आंकड़ा राष्ट्रीय औसत से लगभग दोगुना है
कैंसर अस्पताल 1 से बढ़कर 40 हुए
लेकिन मरीजों के लिए बिस्तर अब भी कम
बुद्धिजीवियों का कहना है कि
> “सरकार का यह नरम रुख कैंसर को खुला न्योता है।”

राजस्व बनाम जनहित
सबसे बड़ा सवाल यही है—
क्या करोड़ों के राजस्व के आगे ओडिशा के नागरिकों का जीवन गौण हो गया है?
नशा विरोधी संगठनों ने सरकार पर ‘मौन सहमति’ देने का आरोप लगाते हुए कड़ा विरोध दर्ज कराया है।
🔴 दोहरी नीति: 21 जनवरी को प्रतिबंध, 29 जनवरी को ढील
⚖️ संवैधानिक संकट: राज्यपाल के आदेश से ऊपर सचिव का पत्र?
🚔 प्रशासनिक भ्रम: छापेमारी दल तय नहीं कर पा रहे—कानून क्या है
🩺 स्वास्थ्य आपदा: तंबाकू सेवन राष्ट्रीय औसत से दोगुना
📢 विज्ञापन का छल: मुखवास की आड़ में खुलेआम नशा
❓ बड़ा सवाल: राजस्व या जनता की जान?

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