
चांपा/टोक्यो।
जापान में चिकित्सा जगत इन दिनों एक अनोखे और क्रांतिकारी प्रयोग को लेकर सुर्खियों में है। यहाँ वैज्ञानिक कृत्रिम गर्भाधान यानी मशीनी गर्भाशय (Artificial Womb) के जरिये भ्रूण विकसित करने के प्रयोग में महत्वपूर्ण सफलता के करीब पहुंच चुके हैं।
सूत्रों के अनुसार, यह प्रक्रिया आईवीएफ तकनीक (इन विट्रो फर्टिलाइजेशन) पर आधारित है। इसमें अंडाणु और शुक्राणु को प्राकृतिक गर्भाशय से बाहर मशीन में निषेचित किया जाता है। इसके बाद भ्रूण को एक विशेष डिज़ाइन किए गए पारदर्शी कृत्रिम गर्भाशय में स्थानांतरित किया जाता है। यहाँ भ्रूण को ऑक्सीजन, पोषक तत्व और हार्मोन उपलब्ध कराए जाते हैं, ताकि उसका विकास प्राकृतिक गर्भ की तरह हो सके।
वैज्ञानिक बताते हैं कि इस दौरान भ्रूण पर लगातार निगरानी रखी जाती है और आवश्यकता अनुसार वातावरण को समायोजित किया जाता है। जब भ्रूण पूरी तरह से विकसित हो जाता है तो सिजेरियन सेक्शन जैसी प्रक्रिया के माध्यम से बच्चे का जन्म कराया जाता है।
संभावनाएँ और चुनौतियाँ
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह तकनीक सफल होती है तो यह उन दंपतियों के लिए वरदान साबित हो सकती है जो प्राकृतिक रूप से गर्भधारण नहीं कर पाते या गर्भावस्था में जटिलताओं का सामना करते हैं।
हालाँकि, चिकित्सा जगत में इस तकनीक को लेकर गहरी बहस भी छिड़ी हुई है। वैज्ञानिक और नैतिक विशेषज्ञ इस पर सवाल उठा रहे हैं कि क्या कृत्रिम गर्भ में पैदा हुए शिशुओं पर दीर्घकालिक दुष्प्रभाव हो सकते हैं।
निष्कर्ष
फिलहाल यह प्रयोग शुरुआती और प्रायोगिक चरण में है। यह कहना जल्दबाज़ी होगी कि इसके परिणाम सकारात्मक होंगे या खतरनाक दुष्परिणाम भी सामने आ सकते हैं। इतना निश्चित है कि आने वाले समय में यह तकनीक मानव समाज के लिए बड़ी संभावनाएँ और गंभीर चुनौतियाँ दोनों लेकर आ सकती है।
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